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अब वाकई राष्ट्र खतरे में है.....

विचार प्रवाह.......


योगेंद्र सिंह परिहार


अभी कुछ वर्षों से देश में लोगों को एक घुट्टी पिलाई जा रही है राष्ट्र सुरक्षित रहेगा तो लोग सुरक्षित रहेंगे। इसीलिए राष्ट्र की एकता और मजबूती के लिए उन्हें समर्थन दो। अभी 2019 के लोकसभा चुनाव में मेरे एक परिचित मेरे घर आये, मैंने उनसे पूछा कि भाई तुमने किसको वोट दिया तो पहले तो उसने टालते हुए कहा कि अपना वोट किसी को बताना नही चाहिए तो मैंने तुरंत कहा कि खराब कर आये अपना वोट तो वो समझ गया कि मेरे कहने का क्या मतलब है फिर उसने जो जबाब दिया वो सुनकर आपके भी होश उड़ जाएंगे मैंने उससे पूछा कि तुम जिस बिल्डर के यहां काम करते हो उसकी नोट बंदी में लगभग कमर ही टूट गई थी फिर तुम कैसे गलती कर आये तो उसने कहा भैया यही लोगों को समझना पड़ेगा "निजी स्वार्थ अलग है, देश अलग है। राष्ट्र की मजबूती के लिए हमें अपना सब कुछ देने से भी नही चूकना चाहिए। मैंने उससे आश्चर्य चकित होकर पूछा कि तुम्हारे बिल्डर ने तो नोट बंदी में लोगों को नौकरी से निकाल दिया था तो उसने तपाक से कहा कि देश के लिए लोगों की जाने चली जाती हैं नौकरी क्या चीज़ है इतना तो लोगों को सहन करना पड़ेगा। है न आश्चर्य की बात! ये छद्म राष्ट्रभक्ति की अफीम का कमाल है। लोग अपना, अपने आस-पास के लोगों का हित अनहित नही देख पा रहे। लोग बड़ी आसानी से उनकी बातों में फंस रहें हैं। उनसे कहा जा रहा है 70 साल में इस देश मे कुछ नही हुआ। अरे! कुछ मत करो अपने बाप-दादाओं से पूछ लो कि वे आज से 70 साल पहले कैसा जीवन बिताते थे और आज आप कैसा जीवन जी रहे हो फिर किसी को कुछ बताने की ज़रूरत नही पड़ेगी। 


मैंने सोशल मीडिया में वायरल एक संदेश पढ़ा था कि "जब जेट एयरवेज के कर्मचारियों की नौकरी गई तो रेलवे के कर्मचारी खुश हो रहे थे कि हमारी तो बच गई और जब रेलवे के कर्मचारियों की नौकरी गई तो बीएसएनएल के कर्मचारी खुश हो रहे थे कि हमारी तो बच गई और जब बीएसएनएल के कर्मचारियों की नौकरी गई तो पारले जी के कर्मचारी खुश हो रहे थे कि हमारी तो बच गई और जब पारले जी के कर्मचारियों की नौकरी जा रही है तो इंडियन एयरलाइन्स के कर्मचारी खुश हो रहे थे कि हमारी तो बच गई और अब इंडियन एयरलाइन्स के कर्मचारियों की भी नौकरी जा रही है तो जिनकी अभी नही गई वे खुश हो रहे होंगे। इन्ही छोटी-छोटी खुशियों का नाम है मोदी सरकार।" इस संदेश को समझकर अब आप चिंतन कीजिये कि ये खुशियां हैं या ज़िन्दगी भर रुलाने वाले गम।


आखिर राष्ट्र है क्या, किस बात से मज़बूत होगा। दिखावे की राष्ट्र भक्ति से, पड़ोसी राज्य की सीमाओं पर दिखावटी हमला करने से। हिन्दू वोट के लिए मुस्लिम विवाह के प्रावधानों को पाबंद करने से। जरा सोचिए सिर्फ आदमी को आदमी से लड़ाकर इंसानियत खत्म करने से राष्ट्र मज़बूत होगा क्या? मुझे लगता है राष्ट्र तो राष्ट्र के नागरिकों से है, न कि उसकी भोगौलिक सीमाओं, पठारों और नदियों से है। ऐसा होता तो दूसरे ग्रहों को भी राष्ट्र की संज्ञा दी जाने लगती। राष्ट्र के नागरिक ही किसी राष्ट्र की असली पहचान होते हैं और राष्ट्र की मजबूती वहां रहने वाले नागरिकों की मजबूती से होती है। नागरिकों की नौकरियां जा रही हैं, उनकी खुशियां छीन रही हैं और उन्हें राष्ट्र की सुरक्षा का पाठ पढ़ाया जा रहा है। बड़ी-बड़ी कंपनियां डूब रही है और लोगों को कश्मीर में ज़मीन खरीदने का सपना दिखाया जा रहा है। सोच लीजिये यदि इसी तेज़ी से लोगों के रोजगार छिनते रहे तो देश मे कितनी भयावह स्थिति बन जाएगी। वोट की खातिर ही तो हिन्दू मुसलमान में नफरत के बीज बोए जा रहे हैं। इंसान की जान खतरे में है लेकिन गाय की हत्या के शक में भीड़ द्वारा प्रायोजित हिंसा कर एक वर्ग विशेष के लोगों को मौत के घाट उतारा जा रहा है, सिर्फ सत्ता हथियाने के लिए। सरकार, इन चालबाजियों से बाज आइए और देश को बचाइए। हमारे संविधान की मूल प्रस्तावना को जब तक पूर्ण रूप से आत्मसात नही करेंगे तब तक राष्ट्र को मजबूती देने की बातें सिर्फ दिखावा मात्र ही हैं। 


70 साल में पहली बार देश में ये सुनने को मिल रहा है कि अंडर गारमेंट की सेल कम हो गई यानि लोगों की आर्थिक स्थिति इतनी कमज़ोर हो गई है कि वे चड्डी भी नही खरीद पा रहे। ये मज़ाक नही है, चिंता का विषय है। इस देश में करोड़ों लोग पारले जी के बिस्किट खा के अपना गुजारा करते थे यदि 5 रुपए का पारले जी का पैकेट लोग नही खरीद पा रहे और घटती सेल की वजह से कंपनी हज़ारों लोगों को नौकरी से निकाल रही है तो ये बहुत बड़ी चिंता का विषय है। स्टेट बैंक जैसी बड़ी बैंक यदि अपनी 400 से ज्यादा शाखाएं और 700 से ज्यादा एटीएम बन्द कर रही है तो हर देश वासियों को समझना होगा कि देश नगदी के गंभीर संकट से गुजर रहा है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार और रिज़र्व बैंक के गवर्नर अब सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर रहे हैं कि 70 वर्षों में पहली बार देश इतने बड़े आर्थिक संकटों से गुजर रहा है। वहीं बड़े व्यवसायियों के लोन लेकर विदेश भाग जाने की वजह से प्राइवेट सेक्टर को लोन देने से बैंक डर रही हैं तो ये डर कौन निकालेगा? सरकार को हर छोटे-बड़े व्यवसायियों को चोर समझने का रवैया भी बदलना पड़ेगा। 


लोग जहां रह रहे हैं वहां अपने परिवार की खुशियों के साथ निश्चिन्त होकर रह सके इस ओर सरकार को ध्यान देना चाहिए न कि उन्हें कश्मीर में ज़मीन खरीदने का दिवा स्वप्न दिखाना चाहिए। ये बात सही है कि हिंदुस्तान का नागरिक भावुक है और उसकी ज़रूरतें बहुत ज्यादा हैं कोई भी सपने दिखायेगा तो वे उनके झांसे में आ जाएंगे ये स्वाभाविक सी बात है। 2014 के आम चुनाव में लोगों को ये लगने लगा कि हमारी तकलीफें पूर्ववर्ती सरकारों की वजह से थी और हमें बहुत मिल सकता था लेकिन पिछली सरकारों ने नही दिया और जब ये कहा गया कि 100 दिन के अंदर विदेशों में जमा काला धन ले आएंगे, लोगों के खातों में 15 लाख जमा कर देंगे, हर वर्ष 2 करोड़ नौकरी दे देंगे तो लोग भ्रमित हो गए और ज्यादा की चाह में अपने भविष्य को और अंधकार की तरफ धकेल दिया।  2019 के चुनाव में वे जानते थे कि हमने एक भी वादे पूरे नही किये है तो लोगों को राष्ट्रवाद, हिन्दू, मुसलमान, गाय, मंदिर और पाकिस्तान में उलझा दिया और फिर मतलब परस्त लोग सिर्फ इतिहास की बातों को तोड़ मरोड़ के प्रस्तुत कर फिर सरकार में काबिज हो गए। अब देश के लोगों को ये समझना चाहिए कि वादा था युवाओं को साल में 2 करोड़ नौकरियां देने का लेकिन हुआ क्या? नई नौकरी की बात तो दूर जो लोग काम कर रहे थे उनके हाथ से भी नौकरियां जाने लगी। लोग यदि इस बात से सुखी हैं कि उनकी नौकरी गई और हमारी बची है तो समझ लीजिए जिस तेजी से बड़ी कंपनियां और संस्थाएं बन्द होने की कगार पर हैं आपकी भी नौकरी बचने वाली नही है। आपकी खुशियां भी ज्यादा दिन रहने वाली नही हैं। यहां राहत इंदौरी जी का शेर फिट बैठता है कि "लगेगी आग तो आएंगे कई घर ज़द में, यहां पर सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है"। बेरोजगारी की आग जंगल की आग की तरह फैल रही है और ये तो तय है कि इससे बचने का उपाय मौजूदा सरकार के पास तो नही है क्योंकि कुछ भी उपाय होता तो वे मुद्दों को छिपाने के लिए रोज नए स्वांग नही रचते। जिस व्यक्ति ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी के नेतृत्व में देश की अर्थव्यवस्था को ऊंचाइयों पर पहुंचाया ऐसे चिदंबरम जी को घर की दीवाल फांदकर तमाशा करके वेवजह यूं गिरफ्तार नही किया जाता। कहा जा रहा है कि चिदंबरम जी पर की गई कार्यवाही भ्रष्टाचार के खिलाफ है तो फिर डंपर और व्यापम जैसे घोटाले पर सीबीआई ने रिमांड लेने के लिए शिवराज सिंह चौहान को गिरफ्तार क्यों नही किया? राजस्थान में 45 हज़ार करोड़ के खनन घोटाले को लेकर सीबीआई ने वसुंधरा राजे सिंधिया को क्यों गिरफ्तार नही किया? छत्तीसगढ़ में 36 हज़ार करोड़ के पीडीएस घोटाले में सीबीआई ने रमन सिंह की गिरफ्तारी क्यों नही की? और महाराष्ट्र में 206 करोड़ के चिक्की घोटाले में पंकजा मुंडे की गिरफ्तारी क्यों नही हुई? इसका मतलब साफ है चिदंबरम जी को गिरफ्तार करना सिर्फ और सिर्फ राजनीति से प्रेरित है और देश का पूरा ध्यान बढ़ती आर्थिक मंदी और बढ़ती बेरोजगारी से हटाने के लिए है। ध्यान भटकाने के लिए लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बखूबी अपना काम कर रहा है खासतौर से इलेक्ट्रॉनिक चैनल। राष्ट्र की मजबूती के लिए झूठी और मनगढंत रिपोर्टिंग ज़रुरी है ये भी 70 सालों में पहली बार देखने को मिल रहा है।


राष्ट्र के नागरिकों को आर्थिक रूप से सुदृढ़ करने के प्रयास किये जाएंगे तब जाके राष्ट्र मज़बूत होगा। क्योंकि जिस तेजी से मंदी छा रही है उससे उबरने में देश को सालों लग जाएंगे। ऐसी विकट परिस्थिति में जब राष्ट्र के नागरिक आर्थिक रूप से विपन्न और बड़ी तादाद में बेरोजगार हो रहे हैं तो ये कहना ही उचित होगा कि अब वाकई राष्ट्र खतरे में हैं!



योगेंद्र सिंह परिहार


(लेखक मप्र कांग्रेस के प्रवक्ता है)


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