वो छलकती आंखे.....

समय की राह पर.....



सुषमा सिंह(कुंवर)


ढल चुकी थी हर तरफ अंधेरा था और तेज बारिश भी मै बिटिया को कोचिंग छोडकर वापिस घर की और लौट रही थी 'बारिश कम हो या ज्यादा आदतन मै कहीं रूकती नही हूं धीरे धीरे चलती रहती हुं,पर आज कुछ देर रूक गई थी एक शॉप पर' आधा रास्ता पार किया था एक महिला पर नजर पडी वो बारिश मे भीगते हुए तेज तेज कदमों से पैदल जा रही थी उसे देखकर मैने अनायास ही गाडी रोक दी पूछा कहां जाना है उसने बाताया आगे वाले मोड से अंदर गांव तरफ जाना है मैने कहा मोड तक छोड देती हूं बैठो वो संकोच से ही सही पर बैठ गई, मैने उससे कहा इतनी बारिश मे पैदल क्यों आ रही थी मोड तक साधन मिलते है काम करके लौट रही हो, वो बोली हां काम पर से लौट रही हूं मैने अगला सवाल किया क्या काम करती हो वो बोली तगारी ढोती हुं आज शाम ठेकेदार नही आया पैसे भी नही मिले किराए के पैसे भी नही थे।मैने कहा आदमी कुछ नही करता वो रूंआसी हो गई बोली आदमी नही है दो बेटियाँ हैं और आज तो आटा भी नही घर पर, इतनी बातचीत हुई तबतक मोड भी आ चुका था मैने गाडी रोकी वो उतरकर जाने लगी तो मैने उसे रोका और सौ रूपये दिए कहा आटा ले जाना उसने मना किया और उसकी आंखे छलक आईं मैने फिर जोर देकर वो पैसे उसके हाथ मे रख दिए वो कृतज्ञता से हाथ जोड़कर आगे बढ गई और मै उसे रोड पार कर जाते हुए कुछ पल देखती रही।
           जब मै उससे बातें कर रही थी तब अतीत से जुडे कुछ संस्मरण चलचित्र बनकर आंखो के सामने घूम रहे थे यह सब बातें यह परिस्थितियां जानी पहचानी लग रही थी अमूमन किसी की मदत करके मन मे एक संतोष का भाव आता है अच्छा लगता है पर आज ईस वाक़ये पर अच्छा लगने के साथ मन मे एक पीडा भी हुई खैर, उस औरत मे मुझे सिर्फ एक मां नजर आ रही थी रूंआसी चिन्तित मगर साहसी और स्वाभिमानी उसके प्रति मन मे आदर का भाव आया एक बार फिर अपने स्त्री होने पर गर्व हुआ और ये गर्व तब तक होता रहेगा जब तक एसी मांए जो मजदूरी कर लेंगी हर परिस्थिति का डटकर मुकाबला कर लेंगी पर अपना स्वाभिमान नही डिगने देंगी आत्मसम्मान के साथ जिएंगी नमन है एसी माताओं को।


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