संध्या मिश्रा की कविता- व्यथा-कथा

व्यथा-कथा


व्यथाओं की कथाएं बहुत लम्बी है
सच है कथाएं तो लंबी ही होती है भले से व्यथाओं की हों
व्यथाएं की भी श्रेणी होती है ये तब महसूस हुआ जब व्यथाएं कथाएं बनने लगी
और इन कथाओं का सबसे दुखद पहलु ये कि ये व्यथा कथाये सदा अनकही ही रह जाती 
किसी कथा के लिए भी ये कितना कष्टकारी कि वो कथनीय न हो सके 
क्यों
कभी समय नहीं जीवन की औचक आपाधापी में
कभी मौका नहीं तो कभी स्थिति नहीं
कभी कोई परिस्थिति नहीं
दुनियां भर के ढेरों काम निरी औपचारिकतायें व्यर्थ गाल बजाऊ इसकी उसकी 
गली की मोहल्ले की देश विदेश की 
निरंतर खोखली चर्चाएँ बहस
आग उगलते खौलते कढाह से निकलते अंगारों से वजनी शब्द
जाने कंहा से मुहँ खोलते ही गिरने लगते पटर-पटर
बस आत्मा की आह पर बात नहीं 
ऐसा नहीं कि बात व्यथा की ज़माने से करनी हो
खुद की व्यथा पर खुद से ही बात नहीं कभी नहीं 
क्यों 
वही समय नहीं हौंसला नहीं बस सीने में धडकनों की जगह भी भय ने छीन ली डर बस एक अनजाना डर धडकने लगता है दिल में पता नहीं क्यों
कोशिशो के बाद भी शब्द ही नहीं मिलते गहन व्यथाओ की कथाओं पर चर्चा को 
लब खुलें भी तो बस सिसकियों के लिए
पलके उठी भी तो बस आँसुओ को छिपाने के लिए
समेटे रहो दर्द को खोखली देह की जर्जर होती इमारत में 
कहीं इन व्यथाओं को शब्दों की हवा न लग जाये 
इन्हें यूँ ही रहने दो अनकहा अनसुना अपरिचित पराया सा 



रचनाकार- संध्या मिश्रा


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