संध्या मिश्रा की कविता-स्याह साथ

स्याह साथ
कभी देखो घोर अंधेरों में 
अंतस की चांदनी से लबालब
धवल उज्जवल पावन आत्माओं का आंनद और उल्लास से भरा नृत्य 
काश देख पाते पर तुमने प्रयास ही नहीं किया या करना ही नहीं चाहा जो भी हो मुझे नहीं पता और मै जानना भी नहीं चाहती 
बताना चाहती हूँ नहीं जानती 
कि तुम समझ पाओगे या नहीं 
मुझे अंधेरों से डर नहीं लगता 
न ही पहले लगता था बल्कि अँधेरे मुझे हमेशा प्रिय लगे 
अंधेरों में मुखौटे नहीं लगाने पड़ते 
न ख़ुशी के लिए न दुखों के लिए अँधेरा निराकार सजीव सजग साकार अटल अलौकिक सत्य की उजास से सराबोर 
काश तुम जान पाते रौशनी में तो शीशे चमकते है  अस्थाई अस्तित्वहीन 
तुमने अंधेरों की सच्चाइयों को कभी महसूस ही नहीं किया ये स्याह साथी कितना अपना है जिसमें निर्भीक हो समाहित हूँ मै निश्चिंत हो


लेखिका-



संध्या मिश्रा, भोपाल


 


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