वन्य प्राणियों की सुरक्षा हेतु उठाने होंगे ठोस कदम


पुष्पेंद्र जैन
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वन्यजीवों के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने एवं लुप्तप्राय प्रजातियों के प्रति जागरूकता बढ़ाने हेतु 20 दिसंबर 2013 को 68 वें अधिवेशन में प्रति वर्ष 3 मार्च को विश्व वन्यजीव दिवस मनाने की घोषणा की है। जिससे वन्यजीवों की रक्षा करने के लिए लोग आगे आयें। मानव जाति को यदि अपना अस्तित्व बनाए रखना है तो पर्यावरण को सुरक्षित रखना होगा। पर्यटन को बढ़ावा देना है, वन्यजीवों से संबंधित उद्योग एवं व्यापार को विकसित करना है, रोजगार के अवसर बढ़ाने हैं एवं वनों को बचाए रखना है तो वन्य जीवों का संरक्षण करना होगा। वन्यजीवों को सुरक्षित रखना मानव जाति का ही कर्तव्य है और कर्तव्य निर्वहन हेतु मानव जाति को अपने चंद व्यक्तिगत स्वार्थों का परित्याग करना होगा। मनुष्य के लिए वन प्रकृति का ऐसा वरदान है जिस पर उसका अस्तित्व, उन्नति एवं समृद्धि निर्भर है। वनों में जिंदगी बसर करने वाले वन्यजीवों से मानव जाति का युगों से विशिष्ट संबंध रहा है। विकास की प्रारंभिक अवस्था में मानव जाति एक वन्यजीव ही थी। विकास के बढ़ते कदमों एवं बुद्धि विकास तथा विकसित मस्तिष्क के परिणाम स्वरूप मनुष्य धीरे-धीरे वन्य जीवन से अलग होकर सामाजिक बन गया और अपने उद्धव की कहानी को विस्मृत कर प्रकृति का स्वामी बन गया है। प्राकृतिक वन और उसमें विचरण करने वाले वन्य  प्राणी आज भी मनुष्य की सहायता के बिना जीवित रहने की बात को सोचते हैं। जबकि मानव समाज इनके अभाव में अपना अस्तित्व बहुत दिनों तक कायम नहीं रख सकता है। प्राणी मात्र के अंतर संबंधों, पारस्परिक आत्मनिर्भरता और जैविक जगत के बारे में जितना ज्ञान भारतीय दर्शन में विद्यमान रहा, जितना प्रकृति, पानी, हवा, पेड़ -पौधे, वनस्पति जीवों की पूजा आराधना एवं संरक्षण की ओर ध्यान दिया गया है उतना संसार की अन्य किसी भी सभ्यता में नहीं है। प्राकृतिक संसाधनों एवं वन्य प्राणियों के संरक्षण के बारे में जितनी सोच-समझ प्राचीन भारतीय समाज को रही है उसकी शतांश भी पश्चात ज्ञान में नहीं है। लेकिन कैसी विडंबना है कि आज प्रकृति और वन्य जीव संरक्षण की बात विदेशी लोग हमें बतला रहे है जबकि प्रकृति संरक्षण तो हमारी भारतीय जीवन पद्धति का मूल अंग है। भारत देश के अतीत में यदि हम जाएं तो पाएंगे कि कवियों की कविताओं एवं लेखकों की रचनाओं में भारतवासियों के प्रकृति प्रेम एवं प्रकृति वर्णन से रोम-रोम पुलकित हो उठता है और मन उनके प्रति अपार श्रद्धापूरित होकर धन्य-धन्य उठता है। रह-रहकर विचार आता है कि कैसा था तब यह सुरभित देश। ऋ षि कन्याओं द्वारा प्रिय वृक्षों का लालन-पालन, गांव-गांव में बाग-बगियां, वन-उपवन आदि न केवल गौरव की बात थी बल्कि उनकी दिनचर्या और तत्कालीन जीवन शैली का अभिन्न अंग था।हमारे पुरखों से विरासत में मिला यह प्रकृति प्रेम वृक्षों के रूप में झलकता जीवन सौंदर्य और सुंदर वृक्षों की प्रति लगाव आज कितना रह गया है। आज प्रत्येक व्यक्ति के आत्म मंथन का विषय है। आज प्राकृतिक वन क्षेत्र घटती जा रही हैं वृक्षों की अनेक प्रजातियां नष्ट हो गई हैं। प्रकृति एवं वन्य जीव संरक्षण आज एक चुनौती बन गयी है। क्या यह सुंदर रंग-बिरंगे पक्षी और मनोहारी वन प्रदेश आज बदलते परिवेश में सुरक्षित रह पाएंगे। क्या पक्षियों की कुछ सुंदर प्रजातियां जिन्हें चंद्र वर्षो पहले हमारे पूर्वजों ने देखा था और अब लुप्त हो गए, फिर हम देख पाएंगे। विकास के दबाव ने प्राकृतिक उत्पादों का विवेकहीन दोहन-शोषण करके आज हमें पर्यावरणीय संकट की ऐसे कगार पर ला खड़ा किया कि अब प्राणी मात्र का अस्तित्व भी संकट में है ऐसी स्थिति में हमारी अमूल्य धरोहर वन्य प्राणियों का क्या महत्व रह जाएगा। शुद्ध प्राणवायु का भाव दूषित जल और उसको और कृतिम रसायनों से मृदा की मौलिकता ह्रास,सिमटते प्राकृतिक वन,वायुमंडल में गैसीय प्रदूषण से बढ़ता तापक्रम खाद्यान्नों में जैविक जनित पोषकता का ह्रास और वर्षा का भाव आदि पर्यावरणीय अवयवों की मौलिक स्वरूप पर भी आज आघात हो रहा है।वनस्पति और वन्य जीवन के संरक्षण पर स्वत: ही एक प्रश्न चिन्ह लग जाता है। विगत तीन-चार दशकों से अभ्यारणों और राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना के बाद इर्द-गिर्द निवास करने वाले किसानों, ग्रामीण और पशुपालकों तथा वन कर्मचारियों अधिकारियों के बीच टकराहट बढ़ी है।यह संघर्ष वस्तुत: दृष्टिकोण का है क्योंकि पीढ़ी दर पीढ़ी इन जंगलों का उपयोग करते आए हैं।आज वर्तमान समय में वन्य जीवों की रक्षा के लिए आगे आना होगा तभी वन्यजीवों का संरक्षण होगा।



पुष्पेंद्र जैन-ललितपुर (उप्र)
(लेखक शिक्षक एवं और विचारक हैं)


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