मासूम व असहाय किसान की मौत और बेशर्म राजनीति


संदीप सिंह गहरवार

कहते हैं राजनीति के अपने रंग होते हैं, पर वर्तमान में राजनीति इतनी बदरंग हो जाएगी, यह देख प्रदेश की जनता खुद हैरान है। कभी राजनीति को राज्य के विकास का आधार माना जाता रहा है, पर इन दिनों जिस तरह का घटनाक्रम देश और प्रदेश की राजनीति में देखने को मिल रहा है उससे जनता का तो लोकतंत्र से पूरी तरह भरोसा उठते देर नहीं लगेगी। जनता के दुःख -दर्द के हिमायती होने का दम्भ भरने और मुसीबत के समय खड़े रहने का दावा करने वाले प्रदेश के नेता इतने खुदगर्ज और बेईमान हो जाएंगे इस बात पर अब सहसा यकीन होने लगा है। उप चुनाव के जरिये सत्ता को बचाने और बनाने के खेल में डूबे इन बेशर्म राजनेताओं और सरकार के नुमाइंदों को सत्ता के हवस में यह भी भान नहीं है कि प्रदेश में घट क्या रहा है। येनकेन प्रकारणेन सिर्फ और सिर्फ सत्ता पर फोकस है। आश्चर्य है कि पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की बिना सिर पैर की बात को बतंगड़ बना कर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया, बीडी शर्मा सहित तमाम अदना से लेकर शिखर तक के भाजपा नेता दिनभर सियासी नौटंकी करते रहे। अरे कमलनाथ तो हैं ही व्यापारी आदमी, उन्हें तो हर वस्तु या आदमी "आयटम" ही नजर आता है। पर हमारी बुद्धि को इतनी कुंठा क्यो मार गई कि हम कुछ भी राग अलापने लगे। माना कि चुनावी मौसम में दलों को सियासी हक है कि वह झूठ फरेब की पूरी राजनीति करें, जो आदतन वह कर भी रहे हैं। लेकिन इतनी गैरत तो होनी चाहिए कि यह भान भी रहे कि राज्य में जनता भी निवास करती है। एक तरफ पूरी सरकार सहित समूचा विपक्ष चुनाव जीतने के जतन में जुटा है, वहीं जबलपुर में हमारे सरकारी सिस्टम की लापरवाही से एक मासूम की अपहरण के बाद हत्या हो जाती है। जरा जाकर पूछिए उस परिवार से जिसके जिगर का टुकड़ा फिरौती देने के बाद भी उनके नजरों से हमेशा के लिए दूर चला गया है। वह परिवार इस समय किस पीड़ा से गुजर रहा है, वह अकल्पनीय है। पर वह रे हमारे प्रदेश की बेशर्म सरकार और उसके नुमाइंदे, कानून व्यवस्था की समीक्षा और उस पर कठोर कदम उठाने की जगह "आयटम" की नौटंकी में खुद के साथ राज्य की जनता को भी उलझाने की कोशिश की। विपक्ष भी इस सरकार से सवाल उठाने की जगह "आयटम" पर आका का बचाव करता नजर आया। मानवता को शर्मसार करती एक दूसरी घटना ने तो सियासत के उस काले चेहरों को जनता के सामने ला दिया है जो यह बताता है कि उन्हें सिवाय अपनी राजनीति के कुछ भी बर्दाश्त नहीं। मालवा की एक सभा में राज्य सभा सदस्य एवं भाजपा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया की चलती हुई सभा के दौरान एक असहाय किसान की कुर्सी में बैठे-बैठे ही मौत हो जाती है। बड़ी बात यह है कि उस किसान की मौत के बाद भी राजनेताओं का भाषण चलता रहता है और तालियां बजती रहती है। किसान की मौत पर भी कार्यक्रम जारी रखने वाले सिंधिया जब इंदौर में "आइटम" को लेकर धरने पर बैठते हैं तो उनकी इस नौटंकी पर यह सवाल जरूर जेहन में आता है कि सड़क पर किसको लेकर उतरने का वादा किया था और कर क्या रहे हैं।
मध्यप्रदेश की जनता को भगवान और खुद को उसका पुजारी बताने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सत्ता के लोभ में इतने कमजोर हो गए कि अब उन्हें यह भी ज्ञात नहीं हो पा रहा कि उनके राज्य में हो क्या रहा है। उस पर नजर रखने की जगह वह सियासी चक्रव्यूह में उलझते नजर आ रहे हैं। इधर राज्य में अपराधियों की वल्ले-वल्ले हो रही है। हत्या और बलात्कार की बाढ़ सी आ गई है। न कोई कानून व्यवस्था को देखने वाला है, न कोई उस पर ध्यान दे रहा है। पूरा तंत्र ही "अंधे पोये, कुत्ते खाएं" की तर्ज पर चल रहा है। सरकार की आंख-कान बने उसके अफसरान भी मुखिया की मनोदशा भांप कर सन्नपात की दशा में चले गए हैं। ऐसे में राज्य बंटाढार की ओर अग्रसर हो जाये तो कोई अतिसंयोक्ति नहीं होगी।

लेखक : -
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं


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