उम्रदराजों के कंधे पर कांग्रेस



भाजपा के मुकाबले कांग्रेस में युवा उम्मीदवारों का टोटा 
लोकसभा का रण जीतने पुराने कंधों पर ही डाल सकते हैं जिम्मेदारी 

संदीप सिंह गहरवार
भोपाल। देश में होने वाले आम चुनाव में महज चंद महीने ही रह गए है, पर अभी भी कांग्रेस तैयारी के मूड में दिखाई नहीं दे रही है। उधर भाजपा ने तैयारी शुरू करके अपने नेताओं को मैदानी जमावट के साथ लक्ष्य भी तय कर दिये है। कांग्रेस फिलहाल अपने युवराज राहुल गांधी की यात्रा में व्यस्त है। जबकि राम मंदिर के उद्घाटन के साथ ही भाजपा लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुट गई है। भाजपा फिलहाल कई जिलों में अध्यक्ष का बदलाव कर संगठनात्मक ढांचे को भी मजबूत करने की कोशिश कर रही है। वहीं कांग्रेस अब तक महज प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ही बदल पाई है। राजनीतिक समीक्षकों की मानें तो भाजपा के मुकाबले कांग्रेस में युवा उम्मीदवारों का टोटा है। सूत्र बतातें है कि भाजपा की तर्ज पर कांग्रेस लोकसभा चुनाव में बड़े नेताओं को उतारने का विचार कर रही है। पर सवाल यह उठता है कि कांग्रेस के ज्यादातर बड़े नेता अब उम्र दराज हो चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस भाजपा की युवा तुर्क टीम का मुकाबला कैसे कर पाएगी। मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में मिली आशातीत सफलता के बाद भाजपा ने मुख्यमंत्री से लेकर पूरा मंत्रिमंडल ही युवातुर्क नेताओं के कंधों पर दे दिया है। ऐसे में कांग्रेस के उम्रदराज नेता भाजपा की इस युवा टीम का मुकाबला कैसे कर पाएंगे, यह तो आना वाला भविष्य ही तय करेगा।  भाजपा ने एक तरफ मिशन-29 का लक्ष्य तय कर उसपर अमल भी प्रारंभ कर दिया है, जबकि लोकसभा चुनाव को लेकर अभी दूर-दूर तक कांग्रेस की कोई तैयारी नजर नहीं आ रही हैं। महज शनिवार को प्रदेश कांगे्रस मुख्यालय में एक वार रुम जरुर स्थापित कर दिया है। ऐसे में कांग्रेस को एक तरफ जहां अपनी सीटें बचाने की जद्दोजहद से जुझने की चुनौती होगी, वहीं भाजपा राम नाम के सहारे मोदी के विकास की वैतरणी पर सवार होकर मिशन-29 के लक्ष्य को पार कर सकती है।  

इन वरिष्ठ नेताओं पर लग सकता हैं दांव

कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह उम्र के 76वें साल में है। उन्हें पार्टी भोपाल या राजगढ़ से उतारने का विचार कर रही है। छिंदवाड़ा से विधायक एवं पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ भी 77 साल के है। इन्हें एक बार फिर छिंदवाड़ा लोकसभा से मौका दिया जा सकता है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया भी 73 साल उम्र के हैं। इन्हें एक बार फिर रतलाम सीट से मौका दिया जा सकता है। ग्वालियर-चंबल संभाग में अपनी पैठ बनाने में जुटी कांग्रेस 72 वर्षीय पूर्व नेता प्रतिपक्ष डॉ गोविंद सिंह को ग्वालियर से मैदान में उतार सकती है। 71 वर्षीय पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुरेश पचौरी भी भोपाल या नर्मदापुरम संभाग से टिकट के प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। इसी तरह 70 साल के पूर्व विधायक केपी सिंह को गुना-शिवपुरी लोकसभा सीट से मैदान में उतारा जा सकता है। वहीं 68 वर्षीय चुरहट विधायक अजय सिंह को भी सीधी या सतना से टिकट दिया जा सकता है। वहीं 73 वर्षीय पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष राजेन्द्र कुमार सिंह को अजय सिंह के सीधी से लडने की स्थिति में सतना से उम्मीदवार बनाया जा सकता है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री व कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष 50 वर्षीय अरुण यादव भी खंडवा से कांग्रेस के प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। 67 वर्षीय कांग्रेस सांसद विवेक तन्खा को कांग्रेस जबलपुर से उम्मीदवार बना सकती है। जबकि 64 वर्षीय रामनिवास रावत को मुरैना लोकसभा से पार्टी उम्मीदवार बनाया जा सकता है। 68 वर्षीय विजयलक्ष्मी साधौ को खरगौन से मौका दिया जा सकता है। सवाल यह उठता है कि विंध्य से लेकर मालवा तक कांग्रेस के पास उम्रदराज नेताओं की भरमार है। वहीं कमलेश्वर पटेल, जयवर्धन सिंह, हिना कांवरे, तरुण भनोट, सचिन यादव, प्रियव्रत सिंह, हेमंत कटारे, सिद्वार्थ कुशवाहा, निलांशु चतुर्वेदी, प्रवीण पाठक, सतीश सिकरवार जैसे युवातुर्क नेता भी है। इसके बाद भी कांग्रेस में लोकसभा चुनाव के दौरान वरिष्ठ नेताओं के कंधे पर नैया पार लगाने की जिम्मेदारी हो सकती है। दरअसल कांग्रेस का मानना है कि वरिष्ठ नेता जिस क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगे उस क्षेत्र से कार्यकर्ताओं को एक कर भाजपा को टक्कर देने में आसानी होगी।

विंध्य में उम्मीदवारों का टोटा 

लोकसभा चुनाव  के लिए कांग्रेस के पास सबसे ज्यादा उम्मीदवारों के चयन की परेशानी है। इस मामले में विंध्य क्षेत्र अव्वल माना जा सकता है। दरअसल विंध्य क्षेत्र से कांग्रेस के बड़े नेता या तो पाला बदलकर भाजपा में चले गए या जो बचे भी वो पार्टी की गुटबाजी के चलते हाशिएं पर रख दिए गए। नतीजन विंध्य क्षेत्र में कांग्रेस का संगठन व्यक्ति विशेष तक सीमित रह गया। नेताओं का घर ही पार्टी का दफ्तर होने लगा। ऐसे में कांग्रेस से जुड़े सतही नेताओं और कार्यकर्ताओं ने खुद को किनारे करना ही बेहतर समझा। पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह को छोड़ दिया जाए तो कांग्रेस के पास विंध्य क्षेत्र के रीवा और शहडोल संभाग में कोई भी ऐसा बड़ा चेहरा नहीं है जिसे लोकसभा में प्रमुख उम्मीदवार के रूप में प्रचारित किया जा सके।  

दमदार विपक्ष की भूमिका से दूर कांग्रेस

 विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद कांग्रेस आलाकमान ने भले ही एक झटके में बदलाव के मूड में कमलनाथ को रातों रात हटाकर मालवा के हारे हुए विधायक जीतू पटवारी को कमान दे दी हो, लेकिन उन्हें नेतृत्व सौंपने के बाद अभी भी कांग्रेस एक दमदार विपक्ष की भूमिका में नजर नहीं आ रही है। राजधानी के रंगमहल चौराहे पर एक दिवसीय धरने तथा ग्वालियर चंबल में भी एक दिवसीय धरने के अलावा जीतू पटवारी के खाते में कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने वाला ऐसा कोई बड़ा कार्यक्रम दर्ज नहीं हुआ है, जिससे कांग्रेस एक आक्रामक विपक्ष की भूमिका में नजर आई हो। राजनीतिक समीक्षक मानते हैं कि सत्ता में होने के बाद भी भाजपा कांग्रेस पर आक्रामक भूमिका में रहती है। वहीं कांग्रेस भाजपा पर हमलावर होने की बजाय प्रतिकार करने में समय गुजार रही है। यही वजह है कि गत विधानसभा चुनाव में 100 का आंकड़ा पार करने वाली कांग्रेस इस बार के विधानसभा चुनाव में महज 65 सीटों पर ही सिमट कर रही गई। जनता का मिजाजा भांपने में कांग्रेस से हो रही देरी धीरे-धीरे अब पार्टी के अवसान का कारण बनती जा रही है। यदि सही समय पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो वह दिन दूर नहीं जब कांग्रेस दो की जगह एक अंक के आंकड़े में सिमट जाएगी। 

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