तब्लीगी जमात का तालिबानी कोरोना जिहाद


आचार्य विष्णु गुप्त
मस्जिदें, मदरसे और अन्य मुस्लिम संस्थान अपने आप को देश और कानून से उपर मान बैठे हैं, प्रधानमंत्री का आज्ञा भी इनके लिए कोई अनिवार्य अर्थ नहीं रखता है। इसका उदाहरण तब्लीगी जमात है। जब फरवरी के अंत में ही प्रधानमंत्री ने यह कह दिया था कि सार्वजनिक कार्यक्रम स्थगित होने चाहिए। फिर भी लॉकडाउन से पूर्व दिल्ली के निजामुउद्ीन क्षेत्र में जलसे कराये जिनमें विदेशी और तालिबानी मौलानाओं को आमंत्रित कराया था, उनके ठहरने की व्यवस्था करायी थी। संपूर्ण लॉकडाउन के बाद भी तब्लीगी जमात का जलसा जारी था। संहिता तौर पर यह समझ लीजिये कि विदेशी नागरिको को ठहरने पर स्थानीय पुलिस को सूचना देनी होती है। विदेशी और जिहादी मुसलमान मस्जिदों और मदरसों में ठहरे हुए थे पर स्थानीय पुलिस को इसकी कोई सूचना नहीं दी गयी। मस्जिद, मदरसे और अन्य मुस्लिम संस्थान अगर होटल के रूप में कार्यरत हैं तो फिर होटल की सारी शर्ते पूरी करानी चाहिए और मस्जिदों, मदरसों तथा अन्य मुस्लिम संस्थानों से राजस्व, इनकम टैक्स और विक्री शुल्क वसूला जाना चाहिए।
जिहादी सम्मेलन था तब्लीगी जमात का यह जलसा कोई साधारण जलसा नहीं था, यह एक तालिबानी और जिहादी जलसा था। आपको मालूम है कि भारत को एक मुस्लिम मजहबी और हिंसक राज मे तब्दील करने की साजिश इस्लामिक दुनिया की है, पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी और तब्लीगी जमात के बीच गठजोड़ है। एक खबर यह भी है कि पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई ने तब्लीगी जमात के जलसे को नियंत्रण कर रही थी। आईएसआई और तब्लीगी जमात की यह साजिश थी कि विदेशी मौलवी और तालिबानी लोग भारत के कोने-कोने में जाकर कोरोना फैलायेंगे और इस्लाम का प्रचार करेंगे।
तब्लीगी जमात की जिहादी करतूत के कारण हम आज गहरे संकट मे हैं। विदेशी जिहादियों की पहुंच देश के कोने-कोने में हो चुकी है। देश भर में जिहादियों की अब तक नौ मौतें हो चुकी है पर ये जिहादी मरने से पूर्व कोरोना संक्रमण को अन्य लोगों के बीच टान्सफर कर गये। बिहार और झारखंड की मस्जिदों से पहले ही विदेशी मुस्लिम और जिहादी पकडे गये थे। पर इन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, उल्टे उन्हें मेडिकल एड दे दिया गया। हमारी सरकारें वोट बैंक की राजनीति के तहत ही मुसलमानों के अपराध और जिहादी करतूत के सामने आत्मसमर्पण कर देंती है। नागरिक आजादी का संकट काल में दुरूपयोग पर अब अंकुश लगना ही चाहिए। नागरिक आजादी के नाम पर मजहबी संस्थानों या फिर मस्जिदों या अन्य मजहबी मुस्लिम संस्थानों को भी अराजक, हिंसक, जिहादी होने और कानून को अपने हाथ में लेने तथा सरकार के आदेश को ठेंगा दिखाने की स्वीकृति खतरनाक है। नागरिक आजादी के नाम पर राष्टीय संकट काल में भी लोग अराजक होकर राष्टीय संकट को बढाने का काम करते हैं। कभी चीन हमले के दौरान कम्युनिस्ट अपने ही देश के खिलाफ और अपने देश के सैनिकों के खिलाफ आग उगलते हैं, चीनी सैनिकों के पक्ष में स्वागत बैनर लगाते हैं चीन को आक्रमणकारी मानने से इनकार कर देते हैं, तो कभी कारगिल युद्ध के दौरान सरेआम पाकिस्तानी झंडे फहारते हैं। शाहिन बांग में सड़कों को घेर जिहादी बैठ जाते हैं और भारत को जमींदोज करने और भारत को इस्लामिक राज में तब्दील करने की कसमें खाते हैं।
निश्चित तौर पर मस्जिदों के मौलानाओं और मुस्लिम संस्थानों के संचालकों तब्लीगी जमता की जिहादियों पर कानूनी कार्यवाही कर इन पर गुंडा एक्ट और राष्ट द्रोह का आरोपी बनाया जाना चाहिए तथा इन सबों की सजा सुनिश्चित करायी जानी चाहिए। मुसलमानों से सामान्य से अधिक दूरी भी बनायी जानी चाहिए।
आचार्य श्री विष्णु गुप्त
नई दिल्ली
मो. 09968997060
नोट:-यह लेखक के अपने विचार हैं। समीक्षा एक्सप्रेस का इससे सहमत होना जरुरी नहीं। 


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