अजय मिश्रा की कविता-रिश्ता

रिश्ता


मौसाजी मेरे घर पर आए
रिश्ते का पैगाम लाए
दूर शहर में रहती है वो
बडी भली लड़की हे वो
सुंदर अति नेक हे लड़की
अजय के लिए परफेक्ट हे लड़की
राम सीता सी जोड़ी बने
घर में रौनक खूब बड़े
जन्मपत्री का मिलान करवाओ
रिश्तेदारी का ऐलान करवाओ
ऑफिस के लिए चलता हू मैं
शाम को आकर मिलता हु मैं
ये कहकर दौड़ा बाहर आया
रिश्ते की बात सुन घबराया
सुबह सवेरे रिश्ते की ही बात
छोटी बहन हे बड़ी चालाक
भाभी को देखने जाना है
भैया को हीरो बनाकर ले जाना है
अभी नही करनी है शादी
छिन जाएगी मेरी आज़ादी
ये सुन पापा को गुस्सा आया
क्रोध से चेहरा तमतमाया
माँ ने तब मरहम लगाई
चुपके से एक बात सुझाई
लड़की पसन्द नही कह देना
रिश्ते को अस्वीकार कर देना
बात माँ की ज़च गई
मेरे दिमाग में बैठ गई
गया तो था ना करने को
उसे देखा तो हा कर बैठा
दिल अपना हार आया
रिश्ता दिल का जोड़ आया
अजय से श्रीमान अजय हुआ
पत्नीव्रता बन शरीफ हुआ



अजय मिश्र


भोपाल


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