कश्मीर : डर के आगे जीत है


   ज्वलंत-जयराम शुक्ल


वाकई ये मोदी की अगस्त क्रांति है। 9 अगस्त को हम हर साल 'अँग्रेजों भारत छोड़ों' के आह्वान का स्मरण करते हैं। अगले साल के 5 अगस्त को 'कश्मीर दिवस' के रूप में मनाने लगेंगे। आजादी के बाद गोवा को लेकर मुक्ति संघर्ष हुआ। लाठी-गोली-शहादत के बाद गोवा पुर्तगालियों से मुक्त होकर देश की धारा में शामिल हुआ। कश्मीर का मामला पेचीदा था, आज के पहले तक वह हमारा होने के बाद भी हमारा नहीं था। यह पेचीदगी कांग्रेस सरकार की दी हुई गिफ्ट थी। इतिहास पंडित जवाहरलाल नेहरू को इसके लिए गुनहगार मानता रहा है। देशी रियासतों के राजाओं-नवाबों को तिरंगे के नीचे लाने वाले सरदार पटेल कश्मीर के मामले असहाय थे। इस विवशता के पीछे नेहरू का शेख अब्दुल्ला प्रेम, नेहरू के पुरखों की मातृभूमि को लेकर एक वैशिष्ट्य भाव था। जिस काम को न कर पाने की कसक लिए सरदार पटेल इस दुनिया से चले गए उसे आज अमित शाह ने पूरा कर दिखाया। पिछले सत्तर सालों में कश्मीर को लेकर ऐसा तिलिस्म रचा गया था जैसे यह इलाका किसी दूसरे लोक का हो। अनुच्छेद 370 और 35ए कश्मीर की स्वायत्तता के लौहकवच बना दिए गए थे। तभी तो परसों तक महबूबा मुफ्ती कह रहीं थी कि जो हाथ 370 की ओर बढ़ा वह जलकर राख हो जाएगा। 


आज गुलाम नबी आजाद राज्यसभा में आपा खोते हुए अर्धविक्षिप्तों सी बात करते रहे। कश्मीर के फैसले को लेकर देशभर में ऐसा जश्न प्रतिध्वनित हो रहा है जैसे कि जैसे कि अपने घर-परिवार के किसी गंभीर बीमार सदस्य के चमत्कारिक स्वास्थ्यलाभ से उसके पुनर्जीवन को लेकर घर के सदस्यों, नात-रिश्तेदारों को होता है।


आज कश्मीर के इतिहास में जाने या गड़े मुर्दे उखाड़ने का दिन नहीं है। आज का दिन इत्मिनान से जश्न मनाते हुए कश्मीर की किस्मत और देश के सम्मुख आने वाली चुनौतियों का आँकलन करने का दिन है। कश्मीर में फिलहाल प्रशासनिक एहतियात है, इसलिए वहां से खबरें नहीं आ रही हैं। पाकिस्तान के हुक्मरान जरूरत से ज्यादा विचलित हैं ऐसी खबरे मीडिया में आ रही हैं। सरहद पर उनकी फौज का जमावड़ा है आईएसआई पीओके में पनाह-प्रशिक्षण पानेवाले आतंकी संगठनों के आकाओं से अगली साजिश पर चर्चारत है।


पाक प्रधानमंत्री इमरान खान अमेरिका से ट्रंप की आश्वस्ति लेकर लौटे तभी से सीमा में हरकतें भी बढ़ी हैं। ट्रंप यदि यह झूँठ न बोले होते कि भारतीय प्रधानमंत्री ने कश्मीर मसले पर मध्यस्थता के लिए कहा है तो संभवतः मिशन कश्मीर थोड़ा आगे भी खिसक सकता था, अमरनाथ यात्रा के सम्पन्न होने तक। अमेरिका ने पाकिस्तान के पलंजर में जो हवा भरी थी उसको पंचर करना जरूरी था। आज के घटनाक्रम से दुनिया को संदेश गया कि भारत अपनी संप्रभुता के मामले में किसी भी ताकत मुँहदेखी नहीं करता। यही दृढ़ता मोदी के 56इंची सीना होने का सबूत है।


कश्मीर में राजनीति करने वाली पार्टियों की यही प्रतिक्रियाएं आपेक्षित थीं जो फारुख- उमरअब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती दे रही हैं। इन्हें अहसास ही नहीं था कि इतना कुछ भी होगा। महबूबा की तल्खी को बेबसी में बदलते जाना, उमर अब्दुल्ला का कर्तव्यविमूढ़ होना यह बताता है कि वक्त के साथ इनके ताजिए ठंडे पड़ते जाएंगे।आतंकवादियों, अलगाववादियों, के सभी लीकेज बंद हैं। घुसपैठियों और पाकिस्तानी फौज को दोजख में भेजने के लिए सीमा पर बोफोर्स तैय्यार है सो फिलहाल यह भूल जाएं कि ये राजनीतिक दल सड़कों पर उतरकर भी कुछ कर पाएंगे। 


पाकिस्तान इसे हर बार की तरह वैश्विक मुद्दा बनाने की कोशिश करेगा लेकिन विश्वबिरादरी के सम्मुख यह अपनी विश्वसनीयता खो चुका है। यूरोप के देशों की हर आतंकी घटनाओं के तार पाकिस्तान से जुड़े मिलते हैं। कुछ इस्लामिक देश जरूर सुर में सुर मिला सकते हैं और इसे मुसलमानों के दमन के साथ जोड़ने की कोशिश करेंगे।


मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस नेतृत्व शून्यता से गुजर रही है। राज्यसभा और बाहर कश्मीर मुद्दे पर गुलाम नबी आजाद लगातार प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। वे कश्मीर के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। आज पूरे दिन देशवासियों का जितना गुस्सा और विपरीत प्रतिक्रियाएं नबी ने झेला शायद इतना कश्मीर के अलगाववादी नेताओं ने भी नहीं झेला होगा। गुलाम नबी सदन में असंयत थे और झूंठे तर्कों के साथ पूरी ताकत से अपनी खीझ निकाल रहे थे। सदन में भी वे कांग्रेस खेमे में अलग-थलग से दिखे। कांग्रेस की ओर से गुलाम नबी के स्टैंड से पार्टी ही दरक गई। उच्चसदन में कांग्रेस के चीफ व्हिप भुवनेश्वर कालिता ने तो इस्तीफा ही दे दिया। महत्व की बात यह है कि भुवनेश्वर पर ही सदन में कांग्रेस के सदस्यों को जोड़े रखने की जिम्मेदारी थी। कश्मीर को लेकर गुलाम नबी के वक्तव्य ही यदि कांग्रेस का आधिकारिक पक्ष है तो समझिए एक गुलाम ने पूरी आजादी के साथ कांग्रेस के अस्थि-पंजर को चेनाब और झेलम में विसर्जित करने का पूरा इंतजाम कर दिया है। कांग्रेस में भगदड़ शुरू हो गई है।


कश्मीर को लेकर केंद्र सरकार की जो खिलाफत भी कर रहे हैं वे भी सँभल-सँभलकर। तृणमूल के डेरेक ओ ब्रायन ब्रेख्त की कविता का अपने तईं रूपांतरण करके संकेतों और प्रतीकों में विरोध कर रहे हैं। सपा, जदयू समेत जो अन्यदल विरोध में हैं भी वे अपने विरोध की भाषा को जलेबी की भाँति घुमाकर कह रहे हैं कि सरकार को सभी राजनीतिक दलों व कश्मीर की जनता को विश्वास में लेना चाहिए था।कमाल की बात यह कि बसपा और आम आदमी पार्टी ने एक कदम आगे बढ़कर केंद्र सरकार के मिशन कश्मीर का स्वागत किया। चतुर केजरीवाल जानते हैं कि यह देश की भावनाओं से जुड़ा मामला है। दिल्ली विधानसभा के चुनाव होने हैं भाजपा का यही प्रमुख मुद्दा होगा और फिर दिल्ली कश्मीर के मुद्दे को लेकर आने वाले समय तक गरम रहेगी।यूपीए की प्रमुख सहयोगी पवार की एनसीपी ने इस प्रकरण से तटस्थ रहने का फैसला लिया है। एनडीए के सभी साझेदार स्वाभाविक रूप से इस कदम के साथ हैं।


इसी जुमे के दिन से जिस तरह कश्मीर में एहतियातन व्यवस्थाएं होनी शुरू हुईं तो उससे यह तो लगा कि कुछ होने वाला है पर इतना कुछ होगा किसी को अनुमान नहीं.. इसीलिए गुलाम नबी ने कहा कि यह तो राज्यसभा में एटम विस्फोट जैसा है। अब तक कश्मीर को लेकर सभी यह कहते हुए डराते आ रहे थे कि यह घाटी नहीं आग का दरिया है, सोच समझ के उतरे। लेकिन मोदी और शाह ने तो इस आग में ही उतरने की ठानी थी, क्योंकि उन्हें यह मालुम है कि इस डर के आगे जीत है। 


मेहबूबा ने कुछ दिन पहले एक फिल्मी डायलॉग मारा था..जिंदा जलाके राख कर दूँगी और तीसरे दिन ही इस्लाम में गुनाह के बावजूद भी हाथ जोड़ने पर उतर आईं। यह कश्मीर की मुख्यधारा के नेताओं का लिटमस टेस्ट था। गुलाम नबी आजाद तो आज धमकी की भाषा में बात कर रहे थे या कुछ-कुछ आमंत्रण दे रहे थे कि चीन और पाकिस्तान युद्ध छेंड़ दे। नबी हताशा की चरम पराकाष्ठा में थे। मिशन कश्मीर को अंजाम देने के पहले ही तैयारियां पुख्ता थी। सरहद पर, वैश्विक मंच पर और यथार्थ के धरातल पर भी। राज्यसभा में कांग्रेस के हंगामे के बीच अमित शाह के भाषण को दबाने की कोशिशों के बीच भी यह दिखा कि गृहमंत्री पूरी फूलप्रूफ वैधानिक तैयारी के साथ आए हैं। 


अमित शाह ने 370 को लेकर कांग्रेस की सरकारों द्वारा समय-समय पर किए गए संशोधनों का भी हवाला दिया और इस तर्क की भी हवा निकाल दी कि कश्मीर पर कोई भी फैसला वहां की विधानसभा की सहमति से ही होनी चाहिए।दरअसल इस समय विधानसभा के सभी अधिकार राष्ट्रपति के पास हैं और उन्हीं शक्तियों का प्रयोग करते हुए सरकार आगे बढ़ी है। यह तय है कि सांविधानिक हस्तक्षेप के लिए यह प्रकरण सुप्रीम कोर्ट जाएगा लेकिन इससे पहले बहुमत के साथ दोनों सदनों में स्वीकृति की मुहर लग चुकी होगी और राष्ट्रपति महोदय कश्मीर की खुशकिस्मती पर दस्तखत कर चुके होंगे। 


और अंत में.. कश्मीर की तीन चौथाई अवाम जो डल झील में हर बरस मेहमाननवाजी के लिए हमारा स्वागत करती है, जो हर साल अपनी पीठपर लादकर तीर्थयात्रियों को बर्फानी बाबा के दर्शन कराती है, जो दुनिया को बेहतरीन पश्मीना साल का उपहार देती है, जो हमारे सौभाग्य के लिए क्यारियों से केसर की कलियां चुनती है, जो हमारे लिए बगानों से स्वादिष्ट और सेहतमंद सेब तोडकर डिब्बों में पैक करके हम तक भेजती है, वह इस भारत देश से उतना ही प्यार करती है जितना कि हम और आप। मोदी-शाह का मिशन कश्मीर इन भोले-भाले कश्मीरियों की मुक्ति का भी पर्व है। वे घाटी की बेइमान सियासत और पाक प्रायोजित खूँरेजी दौर से भी मुक्त होने जा रहे हैं।


संपर्कः8225812813


Comments