ध्वस्त होती राहत की उम्मीदें


 कुणाल चौधरी   


दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के प्रधानमंत्री का अपने देश के लोगों से बात करना इसलिए भी खास होता है क्योंकि वे दूसरी बड़ी आबादी वाले देश का भी प्रतिनिधित्व करते है।  इस समय भारत वैश्विक चुनौती से बुरी तरह जूझ रहा है। देश में लॉकडाउन है और करोड़ों गरीब मजदूर,किसान समेत सभी के लिए यह बेहद कठिन समय है। शुक्रवार सुबह 9 बजे भारत की डेढ़ अरब जनता की निगाहें टीवी पर जमी हुई थी और उनकी आशाओं में प्रधानमंत्री थे,जिनसे इस दुख और  चुनौतीपूर्ण वातावरण में राहत की बहुत सारी उम्मीदें थी। लॉकडाउन और कर्फ़्यू के इन दस दिनों में देश ने हजारों गरीब और मजदूरों को अपने सिर पर सामान ढोकर सैकड़ों किलोमीटर सफर तय करते हुए भी देखा है,भूख से लोगों को मरते हुए भी देखा है और कई परिवारों के सुनहरे सपनों को उजड़ते हुए भी देखा है। यह इस देश के मजबूत लोकतंत्र का कमाल है कि अप्रत्याशित,अनायास और अचानक बिना तैयारी कि देश के लोगों को रात के 8 बजे जहां है वही बने रहने कि अविश्व्श्नीय घोषणा को करोड़ों भारतीयों ने न केवल स्वीकार किया बल्कि उससे उत्पन्न अनगिनत कठिनाइयो से जूझने का जज्बा भी दिखाया। जिसमें दिल्ली,गुजरात, महाराष्ट्र,हरियाणा जैसे राज्यों से आने वाले हजारों मजदूर थे जो बेबसी और लाचारी से जूझते भूखे प्यासे ज़िंदा रहकर और सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर पहुंचे। संकट और समस्याओं के बीच पीएम ने देशवासियों से अपील की कि वो कल रात यानी 5  अप्रैल को रात 9 बजे अपने-अपने घर बालकनियों में या छत पर जाकर मोमबत्ती जलाएं। पीएम ने कहा, जरूरी नहीं कि आप मोमबत्ती ही जलाएं आप चाहें तो घर पर रखी टॉर्च,मोबाइल की टॉर्च या फिर दिया भी  जला सकते हैं। इस समय यह विचार करना लाजिमी है कि देश में रोशनी लाने और फैलाने के लिए अभी महज दीप जैसे प्रतीक  की जरूरत है या इस कठिन दौर में सवा अरब की आबादी वाले इस महान देश का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए और बेहतर प्रयास किए जा सकते है।


लॉकडाउन से लाखों दिहाड़ी मजदूर और गरीबों के चूल्हे नहीं जल रहे है,वो कैसे ज़िंदगी जिये और सरकार उन्हें फौरी राहत क्या देने जा रही है, पीएम के संदेश में ऐसी किसी घोषणा कि उम्मीद थी लेकिन गरीबों को निराशा हाथ लगी। गरीबों के घरों में गैस टंकी मुफ्त में पहुंचाने की घोषणा से करोड़ों लोगों को बड़ी राहत मिल सकती है। किसान असमंजस में है और रबी की फसलें उनकी नष्ट हो चुकी है,किसानों के लिए बड़े राहत के पैकेज की दरकार थी,उसके बारे में भी बात की जा सकती थी। पीएम ने इस बारे में कोई बात न करके देश के करोड़ों किसानों कि हताशा को बढ़ा दिया। कोरोना के बढ्ने को लेकर पूरा देश आशंकित है और वेंटिलेटर की कमी,बचाव किट को लेकर लोगों में भारी चिंता है,इसका क्या समाधान है और क्या इससे निपटने के माकूल इंतजामात किए गए है,इस पर भी देश को विश्वास में लेने की कोशिश तो की ही जानी चाहिए थी। लेकिन देशवासियों कि अपेक्षा के विपरीत पीएम का भाषण यथार्थ और हकीकत से बहुत दूर था,इससे लोगों कि आशाएँ और उम्मीदें बूरी तरह टूट गई।    


भारत एक संघात्मक लोकतांत्रिक गणराज्य है,लेकिन पिछलें दिनों से जो घटनाक्रम दिखाई दे रहा है वह तानाशाही रवैये को प्रतिबिम्बित करता है।  विभिन्नताओं वाले इस विशाल देश के राज्यों के मुख्यमंत्रियों को बिना सूचना दिये और उन्हे बिना विश्वास में लिए लॉकडाउन करने से समूचे देश की व्यवस्थाएं बुरी तरह चरमरा गई,लोगों के भूखों मरने की नौबत आ गई।  कानून व्यवस्था की स्थितियाँ बिगड़ी और इसका खामियाजा आम जनता और प्रशासन को भुगतना पड़ा। मध्यप्रदेश को ही देखिये,संकट के समय मुख्यमंत्री बिना केबिनेट के पूरे प्रदेश का संचालन कर रहे है। किसी लोकतांत्रिक राज्य में यह स्थिति स्वीकार्य नही हो सकती की लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार को गिराकर संकट के समय बिना केबिनेट के कोई मुख्यमंत्री कार्य करें और निर्णय ले,यह तानाशाही का स्वरूप है और इसके नतीजे प्रदेश की जनता भोग रही है। स्वास्थ्य मंत्री के न होने से स्वास्थ्य व्यवस्थाएं चरमरा गई है और इंदौर जैसे बड़े औद्योगिक शहर पर संकट गहरा गया है। गृहमंत्री के न होने से प्रशासन से जुड़े लोगों पर हमलें किए जा रहे है।


जाहिर है देश की जनता कठिनाई में है और उनके जीवन को बचाएं रखने के लिए प्राथमिक जरूरतों की भरपाई होनी चाहिए। प्रधानमंत्री जी,सवा अरब लोगों की भावनाओं को समझिए,देश तो आपके साथ खड़ा है लेकिन अफसोस आप आम जनता जनार्दन की जरूरतों को अब तक नहीं समझ पा रहे है। हम सब घरों के बाहर निकलकर रोशनी तो जलाएंगे लेकिन यह भी चिंता कर लीजिये की दीपक जलाने के लिए गरीबों के घर में तेल है भी या नहीं।       


 


कुणाल चौधरी   


विधायक, कालापीपल, मध्यप्रदेश 


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